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Radha Ratnaprabha
Radha RatnaprabhaCourseLiteratureArticles
3 Feb 2021·3 min read·1·

बिहार में ग्रामीण समाज एक संपदा

बिहार की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति कृषि एवं पशुपालन के लिए उपयुक्त होने के साथ-साथ ग्रामीण परिवेश की आधारशिला का भी निर्माण करती है। ग्रामीण समाज की संस्कृति प्राकृतिक पर्यावरण के अनुकूल, प्रकृति की कोख से उत्पन्न होती है। ग्रामीण परिवेश वहां के प्राकृतिक अवयवों जैसे भू-आकृति, भूगर्भिक स्थिति, जलवायु की स्थिति एवं जीव-जंतु आदि पर निर्भर करता है। ग्रामीण समाज की वेशभूषा, खानपान, रहन-सहन प्रकृति की सुंदरता को निखारती है न कि अनेक प्रकार की समस्याओं को जन्म देती है। इसकी संस्कृति हमारी विरासत है ना कि बोझ। परंतु बदलते परिवेश में अनेक प्रकार के नगरीय प्रभावों के चपेट में आकर ग्रामीण समाज अपने अस्तित्व को खोते जा रही है और जैसे नगरीय पर्यावरण समस्याओं से ग्रसित है वैसे ही ग्रामीण समाज भी अनेक प्रकार की समस्याओं से ग्रसित होता जा रहा है।

ग्रामीण समाज की सबसे बड़ी खासियत एवं पहचान उसकी आत्मनिर्भरता थी जिस पर वर्तमान समय में विकास के नाम पर आघात किया जा रहा है जिसके कारण नगर ही नहीं ग्रामीण परिवेश की खुशहाली भी ध्वस्त होती जा रही है। किसी भी समाज की समस्याएं उसकी आवश्यकता को इंगित करती है इसलिए समस्याओं का समाधान के रूप में आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए किंतु हमारी विकास की योजनाओं में वहां की आवश्यकता को नजरअंदाज करके हम अपने विकास के संकेतों को लागू करने में लग जाते हैं जो प्रदूषण का कारण बनती है।

ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिति मुख्य रूप से कृषि एवं पशुपालन जैसे प्राथमिक कार्यों पर निर्भर करती है इसलिए सामान्य तौर पर हम लोग इसके विकास के लिए हर संभव प्रयास करने को तत्पर रहते हैं। यहां तक हम यह भी नहीं देखते कि क्या इसका प्रभाव सकारात्मक है या नकारात्मक। अतः इसके विकास के लिए हाइब्रिड बीज का प्रयोग, खाद, उर्वरक, कीटनाशक एवं अनेक प्रकार के मशीनी उपकरणों का प्रयोग कर उत्पादन को बढ़ाने में लग जाते हैं और  क्षणिक लाभ के लिए इसके दुष्प्रभावों को नजरअंदाज करते हैं। जिसके परिणामस्वरूप शुद्धता एवं गुणवत्तापूर्ण भोजन नगर तो क्या, ग्रामीण परिवेश में भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। वर्तमान समय में पोषक आहार पर इतना बल दिया जा रहा है कि उसकी शुद्धता ही गौण हो गई है जो सतत विकास का संकेत नहीं है।

वर्तमान समय में हम लोग केवल भौतिक विकास के संकेतको को लागू करने के लिए गुणवत्तापूर्ण जीवन शैली को नष्ट करते जा रहे हैं जिसे पुनः वापस लाना संभव नहीं। अतः ग्रामीण समाज के विकास के लिए एवं उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए वहां के प्रकृति के अनुकूल विकास के संकेतको को तैयार करना चाहिए तथा ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायतों द्वारा क्रियान्वित करने की योजना बनाई जानी चाहिए। विकास के संकेतकों को केवल मात्रात्मक  नहीं, बल्कि गुणात्मक विश्लेषण की आवश्यकता है जैसे गांव में पक्के घर, पक्की नली, पक्की गली, एवं हर घर नल का जल आदि विकास कार्य नगरीय पर्यावरण के अनुकूल है ना की ग्रामीण परिवेश के लिए। ग्रामीण समाज के विकास के लिए कौशल युक्त शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य हेतु योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा व्यवस्था का प्रसार, प्राकृतिक तत्व पर आधारित कुटीर एवं लघु उद्योगों का प्रसार, जैविक एवं प्राकृतिक कृषि प्रणाली का विकास, बागानी युक्त संयोजन कृषि प्रणाली, ग्रामीण पर्यटन का विकास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का गुणवत्तापूर्ण सीमित उपयोग एवं पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी का प्रयोग, सुव्यवस्थित सुरक्षा व्यवस्था, ग्राम कचहरी का सशक्तिकरण, ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायतों का सुदृढ़ीकरण, आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण हेतु किए गए प्रयास, मानवीय जीवन मूल्यों का विकास आदि को प्रभावी एवम सशक्त बनाने की आवश्यकता है। इस प्रकार ग्रामीण समाज के विकास हेतु दृष्टिकोण को परिवर्तित कर विकास के नए आयाम को तय करने की आवश्यकता है।

©# डॉ राधा कुमारी