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वर्ष बाईस
मौत और मातम में गुजरा वर्ष इक्कीस ? नहीं चाहिए तनिक भी हमें आगे इनकी टीस !
कुछ अपनों को खोया कुछ सपनों को बोया , आरब्ध से अवसान तक हम सबने मिलकर ढोया !
ओमिक्रोन समझ न आया डेल्मिक्रोन भी संग में लाया? प्रकृति तेरी रीति-नीति ने खूब हमें हैं भरमाया !
नया साल हैं नई पहल पीना हैं अब नया गरल ? अब शायद उनका भी हल कठिन को करना सरल !
अनसुलझे को सुलझाने की जोर पर हैं आज़माइश ? झंझावातों से क्षत-विक्षत संभालेंगे तुझे भी बाईस !
©कुमार
