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आजादी की धरोहर
ये आजादी हमने विरासत में नहीं पायी है । कितने माताओं ने अपने लाल, तो कितने बहनों ने भाई गवाई है ।
न जाने कितने भाई- बहनों को कफन भी नसीब न हो पायी है । कैसे भूले उन सहादत को, जिनके बदौलत तिरंगे की छाव मिल पायी है ।
है नमन उन रणबाकुरों को, जो बनके रणधीर शत्रुओ को धूल चटाई है । जो होके शहीद मातृभूमि के रज में मिल गए , उन्हें अम्बर सी मिली ऊँचाई है ।
रहेगा ऋणी सदा यह भारतवर्ष उनका, जिन्होंने अपनी सर्वस्व मातृभूमि पर लुटाई है । आओ संभाले इस धरोहर को, जिनके लिए हँस के वीरों प्राण गवाई है ।
©#सतीश
