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अकेला व्यक्ति
व्यक्ति को अकेला खड़ा होना चाहिए, जाति, धर्म, देश, काल, परिस्थितियों के परे
सारे पूर्वाग्रहों और ऐतिहासिक दंभों से दूर, भविष्य की चिंता से मुक्त, वर्तमान को ही अपना धर्म मानना चाहिए
और सजगता को अपनी साधना, फिर व्यक्ति के अंदर का मौन बजने लगता है और यह बजना शोर नहीं है बल्कि जीवन संगीत है,
फिर आदमी अपने आप में ही एक तीर्थस्थल बन जाता है ! शुद्ध, चैतन्य, चलता-फिरता हुआ...
