Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·1·

अंधा कानून

अंत कभी क्या हो सकता, जहां अंधा कानून है। कागवर्णित चतुरो का रेला हो, फांस हो कानूनी दांव पेंच की। बेचारे को ढकेल दिए जाते, अंधेरी लंबी रास्ते पर। तारीख़ पर तारीख़ चलती जाती, नयाय का कोई पता नहीं।

लोकतन्त्र का तीसरा स्तंभ, कार्यप्रणाली जैसे कछुए की। देश कैसे बढ़ सकता, जहां न्याय व्यवस्था इतना ढीला हो। देरी से कौन सा न्याय, इसका का कोई मतलब है। तारीख़ पर तारीख़ चलती जाती, इसका कोई अंत नहीं।

काम हमे करनी होगी, न्याय व्यवस्था तंदरुस्त हो। अंधा कानून का मतलब बस इतना हो, सब बरोबर। कोई भी ना छूट जाए, सबको मिले न्याय समय से। बिना देरी के, द्वेश रहित, दोष रहित हो न्याय व्यवस्था।

ऐसा ना कभी हो, दोषी खुलेआम घूम सके। कानून का ऐसा डेरा हो, न्याय की सदा जीत हो। सच्चाई सर उठा के चल सके, बुराई शर्मसार हो। न्याय व्यवस्था इतनी सरल हो, कोई भी ना इससे वंचित रह जाए।

न्याय सभी को मिल पाए, सचमुच का हो अंधा कानून। काग वर्णित चतुरो का भी नैतिकता हो, फंसाए ना कानूनी दांव पेंच में। कोई ना भी फांसे जाएं, इन खत्म ना होने वाली राहों पर। न्याय सभी को मिल पाए, बिना किसी भी देरी के।

#जस्टिस #अंधकानुन

©#मिथिलेश कुमार