अंतिम है प्रार्थना मेरी जनाचार से
धरती अम्बर हुई प्रकम्पित बेटी के चित्कार से । बेटी स्वयं हुई अचंभित दुराचारियो के भीषण प्रहार से। वह स्वयं को न बचा सकी इतने दुस्सासनो के वार से। उसके मन में एक पश्चाताप क्यों कर बैठी भरोसा ऐसे हत्यार से।
न निभा सकी वह वादा, जो करके निकली थी अपने परिवार से । उसके वदन से हुआ वह व्यवहार, जो होता है एक शिकारी को शिकार से । माता भारती भी हो गई शर्मसार दुराचारियो के अत्याचार से। बहा रही है हमे वह करुण वेदना के अश्रु धार से ।
कर रही है हमे अचम्भित अपने प्रश्नों के वार से । कब मिलेगी नारियों को मुक्ति दुष्कर्मीयो के दुर्व्यवहार से। कब मिटेगा बेटियों का भय रात्रि अंधकार से । कब तक यूँ ही बचते रहेंगे हमे भेडियो की तरह नोचने वाले, कानूनी वार से ।
कब तक यूँ ही माताएँ होगी कलंकित कुकर्मीयो कार्य व्यापार से। कब होंगे हम स्वतंत्र दुराचार के कारागार से । मेरा बस इतना ही प्रश्न संवैधानिक अधिकार से । अंतिम है प्रार्थना मेरी जनाचार से।
ख्याल रखना फिर कोई बेटी न दम तोडे दुष्कर्म के वार से। माँ बहनों के अस्मद को मैहफुज रखना ये युवा पीढ़ी बचा के दुराचार से । अंतिम यही प्रार्थना फिर कोई बहन बेटी दम न तोडे मानवी भेडियो के वार से । स्त्रियों की मर्यादा रहे सलामत निवेदन बस यही सरकार से । उनकी भी सुध लिजिए जो मर रहे मानव, मानवी प्रहार से। फिर न कोई बेटी दम तोडे हैवानियत के वार से
©#सतीश
