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Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

बाल मजदूरी

धर्म संकट है, उधेड़बुन की अंबार भी। जब भी निकलता घर से, मिल जाते ये छोटे बच्चे।

उन दुकानों पर, जहां चाय की चुस्कियां लेते। हमसभी बातें करते, देश और समाज के मुद्दों की।

रेलगाड़ी पटरियों किनारे, सफर करते मिल जाते है। प्लास्टिक की बोतल चुनते, मुंह से गंदी गालियाँ बकते।

फटे मैले कपड़े पहने, काम करते वो गलियों में। कुपोषित ये बच्चे, पेट और पीठ किये एक।

समाज निर्माण में, देश के जीडीपी में है इनका योगदान। इनका क्या हम रखते ख्याल।

निकल जाते बस, कुछ सोच कर इनका क्या। बेमानी लगती, महान भारत की कल्पना मात्र भी।

विचित्र स्थिति बनती, जब इनकी बात भी ना रखता कोई। समाज की इतनी बड़ी समस्या, हम ऐसे छुपाए।

कोढ़ को जैसे रखते है,अशब्द! देखी की अनदेखी करते, मानो सब अच्छा है।

इससे कब क्या होने का, ले बीड़ा हम सभी। कोई बच्चा छूट ना जाए, शिक्षा से। भोजन, रहने खाने की, साथ ही दे इन्हे सम्मान हम। ये भी बन सके, भारत के भविष्य।

चले बनाए सच का सभ्य भारत। जहां ना कोई बच्चा, बाध्य हो श्रम करने को। हो ना उनपर प्रताड़ना, ले जिम्मेदारी हम मिलकर।

करे इनका कायाकल्प, इनके सपने भी निर्माण करे हम। जैसा अपना बच्चा हो, इनके सपने भी हो साकार।

#childlabour #चिल्ड्रेन

©#मिथिलेश कुमार