← PrevNext →
Vinay Indar
Vinay IndarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·3 min read·

बारिश का एहसास

बारिश को देखकर बहुत कुछ करने को मन कर रहा है।पर मन सिर्फ कौंच कर रह जा रहा है। आहा क्या बारिश है। हवा के साथ बारिश ओह...इसकी बूंदे मन में सिहरन पैदा कर रही है। बारिश पर लिखने का बहुते मन कर रहा है पर कहाँ से शुरूं करूँ और कहाँ पर खतम कुछ समझ नहीं आ रहा है। तो चलो शुरू कर दिया बारिश की तरह बरसना ....पता नहीं झमाझम बरसेंगे की टप टप। सब आपके हवाले है।

बारिश त्रिभुजाकार है, आयताकार है, वर्गाकार है। यह सब कुछ होने के बावजूद इसके आयतन का पता नहीं है।

बारिश अनिश्चित है। यह कभी, कहीं भी, दिन में,रात में, सुबह में, शाम में, पहाड़ पर, जमीन पर, रेत में , खेत में, खलिहान में, मरुभूमि में, सफेद पर, काले पर, मोटे पर, पतले पर, हिदुं पर, मुश्लिम पर, बुरे पर, भले पर बस.... बरस जाती है।

बारिश आपने आप में ही अनोखी है। इसका होना और न होना दोनों ही इसकी पहचान है। बारिश होगी तो बरसात हुई और बारिश नहीं हुई तो सूखा पड़ा। यह हर समय अपनी पहचान बनाये रखती है। सूखे से भी इसका वास्ता है और नमी से भी। पर इसकी सूखे से दुश्मनी और नमी से दोस्ती है ऐसा माना जाता है।

बारिश से किसी की आस जुड़ी है। बारिश से प्यास जुड़ी है।

बारिश से बहुत कुछ जुड़ा हुआ है। पर यह बारिश सबके लिए खास है। बारिश होने से पहले और होने पर मोर आनन्दित होकर अपने पंखों को फैलाकर नाचने लगता है। बारिश प्रेमी युगल के लिए मिलान की सौगात है तो विरहन के लिए बेचैनी के बढ़ाने का कारण भी है।

इस मौसम के अपने ही तीज, त्यौहार, गीत, संगीत, मेले और झूले हैं। सावन आते ही डाल पर झूले पड़ जाते है। हाथों में मेंहदी लगने लगती है।

बारिश से पूरा वातावरण हरा-भरा हो जाता है। इधर-उधर या देखो भी जिधर सिर्फ हरा ही दीखता है। बारिश के मौसम का खान-पान ही अलग होता है। इस मौसम में अधिकतर लोग चटपटा खाना पसंद करते है।

भारतीय लोक परम्परा में स्नान को बहुत महत्व दिया गया है। जल-स्नान, वायु-स्नान, अग्नि-स्नान के सिवा और भी बहुत सारे स्नान के बारे में बताया गया है। इसमे मैं बारिश-स्नान को अपनी तरफ से जोड़ रहा हूँ। बारिश में नहाना भी जरूरी है। इससे गर्मी में होने वाली कई त्वचा रोगों से बचा जा सकता है।

बारिश बरसती है। कभी उमड़ कर, कभी घुमड़ कर, कभी गरज कर तो, कभी तड़प कर।

तड़प कर बरसने का अर्थ है-पानी न होने पर भी मजबूरी में बरसाना। ऐसा हो भी क्यों नहीं । बारिश के होने का सम्बंध जल से है। जब जल नहीं होगा तो बारिश कहां से होगी। बारिश और जलचक्र के बारे में हम सबने बचपन में पढ़ा है। स्रोत्रों से जलवाष्प बनता है फिर जलवाष्प ऊपर जाकर ठंडा होता है और बारिश के रूप में बरसता है। यह चक्र तो याद सभी को रहता है पर बारिश किस से अधिक होगी इसके बारे में बहुत कम लोग ही याद रखते है।

नसाद लोगों की है होती रंजिशें बहुत प्यार करने वालों पर बंदिशें बहुत धरा जो खाली है उसे हरा-भरा करो पेड़ पौधों से है होती बारिशें बहुत

बचपन का पढ़ा हुआ ही दिमाग के किसी कोने में दबा हुआ था। उसी के दम पर मैनें कभी यह मुक्तक भी लिख दिया था। जिस जगह पेड़ पौधे अधिक होंगे वहां पर बारिश भी अधिक होगी। पेड़ पौधों को लगा कर या इसकी सेवा करके हम तानसेन की तरह गा सकते है, औरतों की तरह खेत में हल चला सकते है और आम लोगों की तरह बारिश होने के लिए होने वाली पूजा में सम्मिलित हो सकते है।

बारिश का हम नाना प्रकार का रूप देखते है। बारिश का यह रूप हम सभी पर निर्भर करता है। बारिश नहीं हुई तो सूखा पड़ जाता है। बारिश अधिक हो गयी तो बाढ़ आ जाती, बेमौसम बारिश हो गयी तो चेहरे पर मायूसी छा जाती है और मौसम में मौसम की बारिश हुई तो चेहरे को मुश्कान से भर देती है और छोड़ देती है अपनी पहचान खेत में, खलिहान में, दलान में और सारे जहांन में...