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Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

बात खत्म नहीं होती

रात काटता हूँ, बात खत्म नहीं होती। काम बढ़ता जाता है, कभी खत्म नहीं होती।

जब भी बैठा होता अकेले, एक जोश होती है साथ में। कुछ कर जाने की, पथ पे बढ़ता जाता हूँ।

लगता ऐसे लक्ष्य दूर नहीं, पर वो भी बढ़ता जाता है। रात काटता हूँ, बात खत्म नहीं होती।

रात ऐसी होती है, मानो हर समय पर पहरा हो। रात अपनी होती है, दिन मुफस्सिल की।

रात में खोता जाता हूँ, ख्वाब लिए उजाले की। आगे बढ़ाता जाता हूँ, निद्रा की तंद्रा में।

काम का पीछा होता है, ब्रह्माण्ड की गहरी संसार। रात काटता हूँ, बात खत्म नहीं होती।

रात इतनी गहरी है, स्वप्न का पता नहीं चलता। रात जागता हूँ, रात काटता हूँ।

काम खत्म नहीं होती, बात बढ़ता जाता है। जीवन की गहराई टटोले, रात की गहराईयों में।

रात कभी खत्म नहीं होती, दिन की उजालों से। अंदर की यात्रा सतत होती है, रात काटता हूँ।

©#मिथिलेश कुमार