बौद्धिक आतंकवाद
बहुत दिन से सोच रहा था कि बौद्धिक आतंकवाद पर कुछ लिखू पर मैं इस आतंकवाद से खुद पीड़ित होने के बाबजूद भी इसे राष्ट्रीय समस्या घोषित करने का पक्षधर नहीं था ,परन्तु बीते दिन इस आतंकवाद के शिकार बने कुछ मित्रो के मानसिक पीड़ा ने मुझे अपने मन कि बात कहने के लिए विवश कर ही दिया....
बौद्धिक आतंकवाद का वर्तमान में दो स्वरूप स्पष्ट रूप से दिख रहा हैं - पहला संघी और दूसरा वामपंथी ! एक अपने आप को राष्ट्रभक्ति का ठीकेदार समझता हैं तो दूसरा अपने आप को वंचित वर्गो का मसीहा समझता हैं ! दोनों अपने किरदार में जान डालने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहा हैं !
दोनों के बीच अनेक विरोधाभाषो के बाबजूद एक घटिया किस्म का समानता जरूर हैं जो दोनों को एक पंक्ति में खरा करने के लिए कम नहीं हैं !
ये समानता हैं - जो कोई इनके विचारो से सहमत नहीं होते हैं उसे किसी एक विचारधारा का ठप्पा लगाकर उसे एक उपनाम दे कर उसे अतार्किक करार देते हुए अवैध सामान्यीकरण कर देना !
और ये दोनों अपने इस कृत्य से इस प्रकार गौरवान्वित महसूस करते हैं जैसे अंग्रेज "" श्वेत भार सिद्धांत "" (white burden theory ) को प्रतिपादित करते समय ! फर्क सिर्फ इतना ही हैं कि वो विदेशी थे और ये स्वदेशी के रंग में रंगे हुए देशी महानुभाव हैं जो अपने चेतना से सबको गुलाम बनाने के लिए आतुर दिख रहे हैं !
