Amrita Singh
Amrita SinghCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

बेटी हूँ, बेटी ही रहने दो

झूठ मुठ के उस पद वंदन को, संस्कार की चादर का नाम न दो, न बैठ सको दो क्षण जहां, मत छोड़ो कन्या के प्राण वहां, छोटा कर मन को मेरे, बांधो मुझे न संस्कारों में, तोड़ के सारे संकोचों को, तुम्हे जगाने आई हूँ

हमेशा की तरह, पद वंदन होंगे मेरे, पर क्या कभी भी, मुझसे पूछा ? बेटी तू क्या चाहती है? चाहत नहीं, अब आदर्श बनने की, चाहत नहीं कि देवी सी पूजी जाऊं हां हक़ मेरा मत मारो,

बेटी हूँ, और अपना हक जताने आई हूँ भाइयों की ख़ातिर तुम मुझे न सूली पर चढ़ाओ जन्म दिया है तो फर्ज़ भी निभाओ है बुरा ससुराल तो, तुम संग मेरे आ जाओ

न हो ऐसा चार दिनों की चांदनी सी चमकूँ, और फिर विसर्जीत कर दी जाऊं नहीं चाहती, पूजा घर के इक कोने में सजा दी जाऊं असल जिन्दगी के पथ पर, मेरे साथ कदम बढ़ाओ क्षमताएं हैं मुझमें, मुझे भी आगे बढ़ने दो

मत बनाओ इतना सहनशील की, हर जुल्म चुप करके सह जाऊं मत भरो ऐसे संस्कार कि अहिल्या सी जड़ हो जाऊं तुम्हारी थाली का, नेह निवाला कहीं बेहतर है आडम्बर के उन फल मेवों के ससुराल वालों से

कहीं श्रेयष्कर है, साथ तुम्हारा, झूठ मुठ के उस पद वंदन को, संस्कार की चादर का नाम न दो, न बैठ सको दो क्षण जहां, मत छोड़ो कन्या के प्राण वहां.

©#अमृता