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Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

हम यूँ ही भरमाए गए हैं !

काटे थे लाखों पेड़ जो शहर बसाने को, आज वहाँ कुछ पौधे लगाए गए हैं ?

हुआ हैं ख़ूब जमकर प्रचार-प्रसार तालियां संग प्रशंसा के पुल भी बनाए गए हैं ?

रही धूम चहुंओर, नेताओं में भी लगी होड़ डी.जे की धुन पर कमर भी थिरकाए गए हैं ?

अख़बारों ने भी दिया स्थान प्रथम पृष्ठ पर और, फोटू भी बहुरंगी सजाए गए हैं ?

लिखा मिटाया, मिटा लिखाया, बात को हैं यूँ घुमाया ये खेल बड़े ही बख़ूबी से रचाए गए हैं ?

अंतस् में था द्वंद्व मचाया, ख़ुद ने ही ख़ुद को समझाया कि ये तो हमें यूँ ही निष्प्रयोजन भरमाए गए हैं ?

©#कुमार