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भटकते रास्ते
खुद को जैसे-जैसे समझते गए खुद में वैसे-वैसे उलझते गए
हर किसी के नक्शे पा पर चलते गए हम इस तरह रास्ता भटकते गए
जितनी समझ में आई अपनी फितरत उतनी ही दुनियाँ समझते गए
डर लगा है कई बार खुद से मुखातिब होते हुए हम आईनों से करवट बदलते गए
दुनियाँ समझ में आई ही नहीं कभी जितनी आई उतनी में उलझते गए
