चलो अज्ञानता के फन को कूचलते है
चलो अब अज्ञानता के फन को कूचलते है। ज्ञान से दीप्त वातावरण में चलते हैं । लेकर साथ उन्हें, जो जिज्ञासु बन मचलते है। करके उन्हें आँखों से ओझल, जो स्वार्थ की रोटी पर पलते है । चलो इस जहां को करीब से जानने चलते हैं । नन्हे -नन्हे नवनिहाल सडकों पर कैसे पलते है । चलो इस जहां को सम्भालने चलते हैं । जहाँ अपने ही अपनों को स्वार्थी बन छलते है। उस मतलबी जहां को, जहाँ इंसान- इंसान को छलते है । चलो इस जहां को अब बदलते हैं । आपसी द्वेषता के बंध को तोड़ कर, उल्लसित परिवेश प्रस्फूटित करते हैं । लेकर सबक उस प्रहरी से, जो हर वार से सबक लेकर सम्भलते है। चलो अब अज्ञानता के फन को कूचलते है । सूर्य- चन्द्र से होकर प्रेरित, जगत् को प्रदिप्त करने निकलते हैं । जिनसे है त्रस्त जनसमूदाय, उनका अन्त्येष्ठी करने निकलते हैं । इस राष्ट्र से दुष्प्रवृतियो का अन्त करने निकलते हैं । चलो नया समाज गढने निकलते हैं । जन जन में ज्ञान का विस्तार करने निकलते हैं । विस्तृत भूखंड में, भारत अखंड में, विपुल ज्ञानसम्वर्द्धन करने निकलते हैं । भटकते राहगिरों को ज्ञान पथ पर ले चलते हैं । चलो अब अज्ञानता के फन को कूचलते है । भूले को राह दिखाने,हम स्वयं मशाल बन चलते हैं । चलो अब अज्ञानता के फन को कूचलते है ।
©#सतीश
