कॉर्पोरेट स्पिरिचुअल रेस्पॉन्सिबिलिटी (CSpR)
वर्कर्स के स्पिरिचुअल सेफगार्ड (Spiritual Safeguard) के लिये कम्पनियों से कॉर्पोरेट स्पिरिचुअल रेस्पॉन्सिबिलिटी (Corporate Spiritual Responsibility-CSpR) के लिये पैसे लेने पर विचार किया जाना चाहिए।
वर्तमान में Social एवं Environmental Safeguard के लिये कॉर्पोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी (Corporate Social Responsibility-CSR) के तहत कम्पनियों से पैसे वसूले जा रहे है।
CSpR वर्कर्स के मानसिक स्वास्थ्य एवं उनके व्यक्तिगत तथा पारिवारिक जीवन में शांति एवं सुकून का संचार करने के काम आएगा।
CSpR से वर्कर्स को आध्यात्मिक शिक्षा दी जाये,उन्हें शांतिपूर्ण एवं सुकूनभरी जिंदगी जीने की ट्रेनिंग दी जाये।पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन,स्ट्रीट प्ले,इंडोर ऑफिस क्लासेस,केम्प,सेमिनार,इत्यादि आयोजित किए जाये।
हर धर्म,हर मजहब के वर्कर्स को उनके ही धर्म तथा उनके ही संस्कृति को समझने में मदद की जाये।\n\nऐसा इसलिए,क्योंकि वर्कर्स काम के दौरान यानि जॉब पीरियड में धर्म-अध्यात्म पर समय नहीं दे पाते।स्कूल,कॉलेज एवं प्रॉफेश्नल डिग्री के दौरान भी एकेडेमिक शिक्षा के बोझ तले वे आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते।
रिटायर्ड होने के बाद आध्यात्मिक शिक्षा को समझने के लिये वर्कर्स के पास न तो पर्याप्त क्षमता रह पाती है,न ही उन्हें पता चल पाता है कि आध्यात्मिक शिक्षा क्या है और इसकी अहमियत क्या है।
देखा-सुनी में रिटायर्ड वर्कर्स कुछ योग-प्राणायाम करते देखे जाते है।कुछ को मंदिरों में माथा टेकते पाये जाते है।कुछ कथा-कहानियों वाला सीरियल या event attend करते पाये जाते है।
जिंदगी की सारी भौतिक उपलब्धियों को पा चुकने के बाद इन बेचारों के पास मानसिक अशांति और पारिवारिक क्लेश बच जाता है। हॉस्पिटल में ,वृद्धाश्रम में या घर के एक कोने में पड़े इन मासूमों को देखकर दया आती है।इन्हें अगली यात्रा का पता नहीं रहता।कुछ दिनों में कहाँ चले जाएंगे इस सवाल का जवाब न तो डॉक्टर दे पाते है,न इनके सगे-संबंधी।
सभी बोलते है भगवान का नाम लो।ये कोशिश करते है नाम लेने का लेकिन रुचि नहीं आ पाती। थोड़े दिन में ही ये नाम-जपना छोड़ देते है।सारी उम्र इंद्रियों से मस्ती लूटने वाले इन मासूमों की इंद्रियाँ अब नाकाम हो चुकी होती है।जैसे-पंख कटे पंछी रेंगते है,वैसे ही इनकी हालत होती है।
जब इनकी इंद्रियाँ-आँख,कान,नाक,जीभ,स्पर्श इंद्रिय काम कर रही होती है यदि उस समय उन्हें आध्यात्मिक शिक्षा दी जाये ,उस समय इन्हें भगवान के बारे में बताया जाय,भगवान में श्रद्धा पैदा की जाये तो शरीर की नश्वरता को,बुढ़ापे को,बीमारी को,मौत को,पुनर्जन्म को ये समझ पाएंगे।
इनके मस्तिष्क में इन सवालों के जवाब होंगे की मरने के बाद इनका क्या होगा?मरने के बाद ये कहाँ जाएंगे? फिर से धरती पर जन्म लेंगे या नहीं? जन्म लेंगे तो किस जीव में?,आदि-आदि।
एकेडेमिक शिक्षा लोगों को जीना सिखाती है,जीने के साधन जुटाने का साधन उपलब्ध कराती है।वहीं आध्यात्मिक शिक्षा लोगों को जीवन का मकसद सिखाती है और मस्ती से मरना सिखाती है।
मरना सभी को है,इस आर्टिक्ल को लिखने वाले को भी और इस आर्टिक्ल को पढ़ने वाले को भी।क्यूँ न मरने के बारे में भी थोड़ी तैयारी कर ली जाये।
