डाकिया
डाक घर एक स्मारक, मोड़ का नाम बन खड़ा। अचम्मभित हूं देखकर, डाकिए गुम है। ले ली जगह ईमेल, बीन तार वाले यंत्रों ने। सोशल मीडिया का आधिपत्य है छाया।
सेकंड मिनटों की बात है खबर बन गई। कुछ मीडिया वालो का दावा, इतने तीव्र। घटना घटने के पहले की खबर, लाता आजतक। खबरें ऐसे फैलती, पूरे विश्व में प्रसार छू मंतर सा।
ऐसी लगती बिना तार वाले, इंटरनेट का जादू। ले ली जगह ईमेल, बीन तार वाले यंत्रों ने। सोशल मीडिया का आधिपत्य है छाया। डाक घर एक स्मारक, मोड़ का नाम बन खड़ा।
अचम्मभित हूं देखकर, डाकिए गुम है। मर्म एवम् यादें, वो चिट्ठी वाले दिन का क्या कहना। डाकिए का इंतजार, कैसी कैसी भावनाएं उमर पड़ती। खबर पाने पड़ खुशी की लहर, गम देर से पहुंचती।
खबर पढ़ाने दौड़ पड़ते, पढ़े लिखे चाचा भइया से। चिट्ठी नहीं ऐसे भावनाएं बोलती, उनकी रूह रूह का स्पर्श। इश्क वाली बाते, बड़ी लुका छिपी की बात होती। कलम बंद मिजाज से व्यक्त, इन चिट्ठी से उतरता।
आज खबरे ऐसे दौड़ती, इसका कोई मेल नहीं। इमोशंस का ऐसा कन्फ्यूजन, सब गड़बड़ झाला सा है। अब सोशल मीडिया, बेतार वाले यंत्रों ने कभी धूम मचाया। छूट गए भावनाएं, इन इंफॉर्मेशन क्रांति के काल में।
इतनी सारी खबर, मानव जीवन का जंजाल बना। अब फिर है चिट्ठी का इंतजार, अच्छे दिन आएगी। डाकिया गुम क्यो है, उनके अंगना भी ना हो शूनी। डाकघर स्मारक क्यो, चिट्ठी पत्री करे, अपने क्षण बाटें।
डाकिया के दिन वाले मर्म, निराली थी, यादगार भरे पल। चिट्ठी लाया डाकिया, दूर कौरी की चीज बनी। लौटा मुझे, बच्चो वाले दिन। ले विराम तू, इन बेतार वाले यंत्रों से। यही है स्वास्थ्य का राज, लौटे अपने पूर्ण परिवेश में।
#डाकिया
©#मिथिलेश कुमार
