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Amrita Singh
Amrita SinghCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

दरख़्तों की बातें

सोचो,

अगर दरख़्त चल और कह पाते, अपने चोट को अगर वो कह पाते...

बूढा हूँ,

पर प्राणवायु, फल-फूल से पूरा हूँ।

दरख़्तों की हर चोट के प्रतिकारों की करो गिनती, कुदरत ने कर दी है, अब वकालत उनकी...

पूछे फिर, मिटा पाओगे क्या उनके निशान वसुधा से???

जेठ अब अधिक तप रहा, सावन-भादो भी जल से सूखा,

नये दरख्तों से पूछो,

क्या बन पायेंगें पक्षियों के ठिकाने, लगा पाओगे सावन के झूले, रखो याद अब जीने का सलीका....

.......अब तो समझो।

©#अमृता