दीदार प्रकृति की
रुक रुक करता, दीदार प्रकृति की आभा का। रुक रुक करता, चिंतन, मंथन। बेजोड़ की पहेली समेटे है, अपने सीने में। छाती 86 का हो रहा है, सदा बढ़ते सिमटते।
रुक रुक कर, नए नए खेल, हो रहे है। प्रकृति का बनता, बिगड़ता। कहीं लिल लेती है, बढ़ती दौर को। शरुआत करती, नए चमन का।
बेजोड़ की पहेली समेटे है, अपने सीने में। छाती 86 का हो रहा है, सदा बढ़ते सिमटते। मानो एक पहेली कह राही है। 56 की क्या सीमा है, सदा बढ़ते सिमटते।
प्रकृति के खेल बड़े निराले,ऊपर नीचे कर रही है। सब लग गए राजनीति के खेल में, ये अपनी छटा बिखरे। कह रही है, छाती 56 की क्या सीमा है। करे विस्तार अपना, लंबी लकीर खींचे।
चलता जाता हूं, रुक-रुक कर। करता रुक कर, चिंतन, मंथन। बेजोड़ की पहेली समेटे है, अपने सीने में। छाती 86 का हो रहा है, सदा बढ़ते सिमटते।
#nature #PoliticsPunch #इलेक्शन
©#मिथिलेश कुमार
