गांव की सड़क
बारिश थे, बादल मंडरा रहे थे, झुलस गर्मी थी। विचल रहा मन था।
जूनून भी थी, उत्साह भी थी, कुछ कर गुजरने की चाहत भी।
पता नहीं कहां जाना था, एकदम सी दूर-दूर तक सभी शांत बैठे थे।
चला जा रहा था, उस मंजिल की ओर। वो भी बना दी गई थी, समाज की दकियानूसी से।
टूटी कच्ची सड़क कहा जाती है, बिल्कुल पाता थी। तेज की वारिश थी, घनघोर अंधेरा था।
चला जा रहा था, एक दो पहिया खंजर बाईसिकिल के साथ। हिम्मत थी,
केवाल काली मिट्टी की कच्ची सड़क जो वर्षो से पक्की होने का इंतजार करते करते थक चुकी थी।
मिट्टी पकड़े उस चक्के को ऐसे, लगाव उस दो चकिया से ऐसी। माथे उठा दो मिल की यात्रा उन बचपन पर, बहुत भारी पड़ रहा था।
फिर भी एक खीज, मन ही मन, बदला की भावना, सपने की उड़ान ओढ़े चले जा रहा था। ऐसे थे बचपन के वो दिन, गांव की वो सड़क।
©#मिथिलेश कुमार
