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हँसती खिलखिलाती जिन्दगी
जिन्दगी जीना आसान कहाँ? कदम-कदम पर है इम्तहान जहाँ।
एक द्वंद-सा लगा रहा महफूज है यहाँ-वहाँ । होता यहाँ सफल वही जो खामोश लब्ज लेकर सब कुछ सहा।
लाखों आए गम फिर भी स्थिर रहा । संघर्षों में न पाँव पिछे रहा, न उम्मीदों का महल ढहा ।
हो गई धन्य धरा उसके पाँव पड़े, जहाँ-जहाँ । झोली में आई वही खुशी, जिसका चाह रहा।
मिली मंजिल तब पाँवो को देख यह एहसास हुआ कि काँटों भरा राह रहा ।
जाते वक्त समझ पाया कि कितनी खूबसूरत है यह जहां । अन्तिम समय जाना मैं अगर स्वयं हो सही तो जीवन बोझिल कहाँ ।
हर रात कटेगी शूकून में रहो यहाँ या वहाँ । आओ सब मिल बनाएँ हँसती खिलखिलाती जहां । दिखेगी स्वर्ग की छटा अब यहाँ ।
©#सतीश
