लेखन के संदर्भ में
लेखन एक कला है, जो केवल एक ही परिश्रम की मांग अपने साधकों से करती है, वो है अभ्यास, अभ्यासी मन जब लिखने का अभ्यस्त हो जाता है, तो माँ शारदा अपने साधकों को शारदेय होने का वरदान अपने आप देती है, और वो परिलक्षित होता है उसके लेखन में, लेखन का अभ्यास भी ठीक जप या ध्यान करने जैसा होता है, सब काम कर लेंगे जब इसको करने का समय आएगा तो टाल देगे, बस कुछ बुनियादी फ़र्क इतना सा है कि ध्यान ( मेडिटेशन ) में बैठने के समय हमारे अंदर चंचलता का बवंडर उठ खड़ा होता है, जबकि लिखने के समयमन निर्विकार हो जाता है, जैसे ही हाथों में क़लम औऱ सामने कागज़ आया नही की मन आपका शरीर छोड़ फ़रार हुआ नही,विश्वास न हो तो कर के देख लीजियेगा, दो पंक्तिया लिखने में ब्रह्मांड घूम लेंगें, पर लिख नही पाएंगे, पर तुर्रा यह कि अपने को कालिदास से कम भी नही समझेंगे, धीरे धीरे आपके अंदर का कालिदास मरता जाएगा और आप सूरदास बन यूट्यूब पर संदीप माहेष्वरी औऱ न जाने कितने लोगों को सुन प्रेरित होते रहेंगे, पर जिंदगी भर प्रेरित नही होंगे,क्यूंकि प्रेरणा बाह्य होता है, आरोपित होता है, पाश्चात्य अवधारणा है, बौद्ध दर्शन का क्षणिक वाद का सिद्धांत लागू होता है, पर प्रेरणा स्वतः स्फूर्त होता है, स्व प्रेरित होता है, भारतीय अवधारणा है और इस पर अहम् ब्रह्स्मि का भाव रहता है |
