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Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

ईश्वर का ध्यान

कर रहा हूं, ईश्वर का ध्यान। पान कर रहा, प्रकृति के आभा का। कोयल की कुं कूं, मैने की उछल कूद। गौरेया है बड़े मस्ती में, गौरवान्वित करती।

सामने शो प्लांट, सुईआ मुईए कांटो वाली। गिलहरी सी लगती, बड़ी रोचक। कर रहा हूं, ईश्वर का ध्यान। पान कर रहा, प्रकृति के आभा का।

कुत्ते की भौंकने की आवाज, चिड़ियों की चिं चिं मद्धिम सी। बड़ी मनोरम लग रही, रेलिंग से साथ खड़े। पिडो रहा इस दृश्य को, मनमोहक है यह सुबह।

चारो ओर है मकान, उंची ऊंची इमारतें। इन सभी के बीच, एक मन की छोटी बगिया। मनोरम है, मनमोहक है, ये प्यारी सी दुनिया।

ये मन ऐसा लग रहा है, रोमांचित हो। उड़ान भर रही, प्राकृति की विशालता के साथ। साथ खड़ा हूं, शमा गया हूं, एकाकार हो गया हूं।

बड़े रोचक ये पल, सृष्टि के सृष्टा मिलन कर। कर रहा हूं, ईश्वर का ध्यान। पान कर रहा, प्रकृति के आभा का।

#प्राकृति #नयेसुबह #मन

©#मिथिलेश कुमार