जनसंख्या नियंत्रण
प्रकृति प्रेम उमड़ पड़ी, उफान पे है। चीर दूँ सीना, दिखा दूँ हनुमान सा। भक्ति एवम् शक्ति, सीता राम की।
गंतव्य पे हूँ , चल पड़ा हूँ । रास्ते गुजरती है, उन वादियों से। भीड़ खड़ी है, पेड़, नदियों, पहाड़ों की।
सहलाती हमे, झुर्मुट बांस की पत्तो से। बाग-बाग कर देती, इन अँखियों को। ओढ़े प्रकृति, हरियाली की चादर से।
कहती है, थक मत तू। बस एक राह तू, चलता जा। सरपट दौड़ती बस, उन राहों पे।
चुप हो, बेचारा क्यों बैठे हो। हमारी इज्जत क्यों लूट रहे, सब? जनसंख्या की क्यों, इतनी भारी है।
रोक लगा इन, अनियंत्रण पर। तभी मेरी खुंबसुरती हरियाली सी। हाथ बढ़ा, जगाओ उन मानव को।
बता उनको, मेरी कीमत। रोक लगा उन अनियंत्रण पर। प्रकृति की क्या गलती है।
प्रकृति प्रेम उमड़ पड़ी है, उफान पे है। चीर दूँ सीना, दिखा दूँ हनुमान सा। हिलकोर उन्हें तू, बता मेरी कीमत।
प्रकृति बोल रही है, समझा रही है। रोक अनियंत्रण, अब यहाँ सीमा है। जनसंख्या की भी एक सीमा है, ना तोड़ इसे।
#पॉपुलेशन
©#मिथिलेश कुमार
