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Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

जितिया व्रत

चौक-चौबारे, फैली है खुशियाँ, मन गुनगुना रहा है, मन को लुभा रहा है, बच्चे की किलकारियाँ, खुशियाँ फैला रही है।

कभी सूनी ना हो घर की बगिया, हर माँ की है चाहत। व्रत कर रही है, जितिया की ये ऐसे। खुद हार कर भी, बगिया रहे सलामत। ऐसा व्रत कर रही है, तीर्थ कर रही है।

दुकानों में बैठे, अन्नरशा की ये खुशबू। घर-घर पहुंच रही है, सबको मजा दे रही है। माँ व्रत कर रही है, तीरथ कर रही है। सबकी कोख रहे सलमात, जितिया कर रही है।

माँ प्यार झलक रहा है, बबुआ के खातिर। बच्चे लिपट रहे है, माँ का है आंचल। मनमोहक लग रही है, प्यार की ये गंगा। सदा बहती रहती, अपन बच्चवा की खातिर।

पूरी जिंदगी कर दी न्योच्छावर, कोख़ रहे सलामत। मन गुनगुना रहा है, मन को लुभा रहा है। बच्चे की किलकारियाँ, खुशियाँ फैला रहा है।

ऐसी है हमारी मैया, खुद रो रही है। हमे हंसा हंसा के, हमे जिला रही है। खुद पे लादे है, कष्टों का बेड़ा।

मैया का कर्ज जैसे, खत्म ना हो पूरा जीवन। पूरे बच्चो के खातिर, भारत माँ तप कर रही है जितिया कर रही, कोख रहे सलामत। व्रत कर रही है, तीर्थ कर रही है।

भारत माता की जय!!!

#जितिया #भारत #माता

©#मिथिलेश कुमार