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Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

कच्ची नींद

इतना सवेरे सवेरे, जगा दी है निंद्रा ने। नए नए आपबीती लिए, धमक पड़ी। ट्रिन ट्रिन की आवाज, जीवन की फांस बनी। स्मार्ट फोन की वज्रपात, कच्ची नींद से उठा गई।

तलाश रहा निंद्रा की, बैठा सोचता आंघियाई हुए। फिर सोता जाता, नए नए सपने का अंबार लिए। सपने कुछ नहीं, वो दवे हुए भावनाएं का प्रकटीकरण मात्र। कच्ची नींद ने, कुत्सित दबे भावनाएं जीला गई।

लगा समझने की कोशिश, क्या राज है इन सपनों का। रोक दिए जाते जिंदगी की प्रवाह, बाह्य परिस्थितियों द्वारा। निकलती बस तुरुप में, इन स्वप्न के द्वार उसे पाने की कोशिश। जिंदगी तो दौड़ लगाती, फिराक में है, फैलाव अनंत की।

इतना सवेरे सवेरे, जगा दी है निंद्रा ने। नए नए आपबीती लिए, धमक पड़ी। लगा सुलझाने, साथ देने को आती जाती घटनाएं को। बढ़ती आधुनिकता, सोशल मीडिया ने चुरा ली है निंद्रा को।

ट्रिन ट्रिन की आवाज, जीवन की फांस बनी। स्मार्ट फोन की वज्रपात, कच्ची नींद से उठा गई। दूर रखे इन बिना पूंछ के फोनवा को, साथ चल पड़ती । सर्विलेंस ने तो, प्राइवेसी को तार तार किया।

इसके प्रयोग को संतुलित करे, तभी शांति संभव जीवन में। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट से अवकाश लेकर ही, स्वास्थ्य संभव। इतना सवेरे सवेरे, जगा दी है निंद्रा ने। स्मार्ट फोन की वज्रपात, कच्ची नींद से उठा गई।

#electronicgadgets #ewasterecycling #अनिंद्रा

©#मिथिलेश कुमार