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कल की आपाधापी
कल की आपाधापी, चुरी ली है पूरी निंदिया। चुरा ली है अंखियां, चुरा ली है चैना।
कभी खत्म ना होने वाली, समय का तगादा। चलता जा रहा है,गुजरता जा रहा है।
मिलके भी तुमसे, पास ना आ सके हम। मर के भी हम, जीते जा रहे है।
कल की आपाधापी, चुरी ली है पूरी निंदिया। चुरा ली है अंखियां, चुरा ली है चैना। आंखे खुल ना रही है चेहरा फूल सा गया है। निंद्रा जोरो की आ रही, पर काम ऐसा फंदा है।
फाँसता जा रहा, लिपटता जा रहा है। निकलने की कोशिश, बार-बार है।
पर निकाल, ना पा रहा हूं। जोर की निंदिया, आंखे बंद कर रही है। लेकर निंदिया गोद मां की, सोने को कर रहा है।
कल की आपाधापी, चुरी ली है पूरी निंदिया। चुरा ली है अंखियां, चुरा ली है चैना।
©#मिथिलेश कुमार
