रावण दहन की परंपरा में छुपे संवाद को समझें।
आज प्रातः अपने घर से ऑफिस तक आने के दौरान मैंने कई जगह रावण के पुतले को उनके कई संबंधियों समेत खुले मैदान में खड़ा पाया।पास में लगे बैनर को पढ़ने से ज्ञात हुआ की ये महाशय शाम में जलाये जाएंगे।साथ में भव्य आतिशबाजियां भी होंगी और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।
आज विजयादशमी का त्योहार है।ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम नें लंका में रावण का वध किया था।तभी से ये परंपरा चली आ रही है।श्रीराम जी ने रावण को धनुष वाण से मारा था। वो भी उनके नाभी के अमृत को सुखाने के बाद।रावण को जलाने वाली परंपरा कहाँ से चली इसका कोई साक्ष्य नहीं मिल पाया है।
रावण एक दुष्ट आत्मा था उसने माता सीता को अगवा कर लंका ले गया था और वहाँ माता सीता से प्रेम-विवाह करने का प्रस्ताव रखा था यह हम सभी जानते है।श्री हनुमान जी,श्री विभीषण जी और श्रीराम जी के बार-बार अनुरोथ करने पर भी जब रावण माता सीता को
न लौटाने की बात पर अडिग रहा तो श्रीराम को युद्ध करना पड़ा यह कहानी भी हम सभी जानते है।
एक नजर में ऐसा लगता है,रावण के साथ युद्ध और उसकी हत्या मात्र एक स्त्री को लेकर था।कुछ लोग तो यहाँ तक कह देते है की रामजी दूसरी शादी कर लेते।आज के समय में जब किसी की पत्नी किसी के साथ भाग जाती है,यह किसी की पत्नी को कोई भागा कर ले जाता है या तलाक हो जाता है तो पति जी दूसरी शादी कर लेते है।
मित्रो,राम लीला के मर्म को जब आप समझेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि रावण के साथ राम का युद्ध,लंका दहन और रावण का वध मात्र एक स्त्री के लिये नहीं था।यह अधर्म और धर्म के बीच का युद्ध था।रावण अधर्म को प्रश्रय और बढ़ावा दे रहा था।अपनी तपस्या के बल पर उसने लगभग देवी-देवताओं को अपने वश में कर लिया था।देवताओं को अपने नौकर-चाकर कि तरह रावण उपयोग करता था।
भगवान श्रीक़ृष्ण ने भगवद् गीता में कहा है-"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥" इसी वाक्य को सत्य करने के लिये भगवान राम ने जन्म लिया था।रावण द्वारा सीता का हरण करना तो एक तात्कालिक कारण था।यह धर्मात्माओं की एक बड़ी योजना थी।
हम रावणी बुद्धि से अपने आप को आजाद करें।स्त्री-पुरुष एक दूसरे का परस्पर सम्मान करे।
