कोटेश्वर धाम
पहुंचा साथ में एक के, द्वार कोटेश्वर धाम की। बड़ी मजे से दर्शन की, लिए नाम शिव शंकर के। किया ध्यान, बगल के दरखत पीपल तले। कोशिश है समझू राज इसके सभी।
ईश की ध्यान लग गई, अन्दर की यात्रा में हूं। जिंदगी बस ढूंढ रहा, उद्देश्य सृष्टि की। सदा अग्रसरित,नीहछल, अनुपम, शांत व हलचल सी। चल पड़ा हूं, अन्दर की यात्रा पर, अनंत की ओर।
वहां ना कोई है, लालसा ऐसी, बस एक ही उद्देश। प्रकृति की रचना कैसी, कैसे इसकी प्राकृति। बाहर की अनुभव भी है, सारे उसके भाग। अन्दर की यात्रा कुछ नहीं, बस सत्य की है पहचान।
जीवन का उद्देश्य है बस, अन्दर की यात्रा। सुखमय सा, सभी स्तरों पर। स्वास्थ्य, शांति, करुनापुर्ण एवम् आनंद की पराकाष्ठा, अन्दर की यात्रा ऐसी। सदा अग्रसरित, नीहछल, अनुपम, शांत व हलचल सी।
पहुंचा साथ में एक के, द्वार कोटेश्वर धाम की। बड़ी मजे से दर्शन की, लिए नाम शिव शंकर के। सतत् अन्दर की यात्रा पर हूं, विचित्र सा अनुभव। समाहित, सम्मोहित, सम्मलित ईश व सबमें, ही अन्दर की यात्रा।
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©#मिथिलेश कुमार
