कुएं के पानी
कुएं प्यास बुझाने को, बैठी है। मानो उनका प्यार बोलता है।
इकरार करती हुई, कहती है। तुम्हारा हमारा एक पुराना रिश्ता है।
बिल्कुल घरौंदा सी, प्यारी सी। शांत बैठी है, गले लगाने को।
प्यास बुझाने को, खोल रखी बहियां। मानो उनका प्यार बोलता है।
बिल्कुल सुडौल, गोलाकार लिए। घेरती हमे, भूल गए क्या।
गाँव कहाँ है,आँगन क्यों है सूनी। कब तक अँखिया चुराये, रहोगे अकेले।
घर आँगन की किलकारी, गूंजती है। हुजुमों की टोली, घेरे गोलाकार लिए हुए।
खारी हो गई क्यों, इन कुएं की पानी। पर सदा समेटे है एक कहानी।
मिठास लिए हुए है, समुन्द्र किनारे। उन कुएं के पानी, द्वारिका के पांडवकुआं।
चल परी है, रोहट। घूम रही है, बैलो की टोली।
खेत सींच गई, चारो ओर हरियाली। कुएं प्यास बुझाने को बैठी है।
#वॉटर #प्रेम #जलप्रदूषण
©#मिथिलेश कुमार
