← PrevNext →
Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

लहू से लहू धोये जा रहे

लहू से ही लहू धोये जा रहे हैं लहू के ही फसल बोये जा रहे हैं !

उम्मीद थी अब तो तिलिस्म छूटेगा चलो देर से ही सही मुकद्दर टूटेगा !

पर आज भी हम खुद से रूठ रहे हैं और अपनों के संग यूँ ही छूट रहे हैं !

रक्त आखिर कब तक विरक्त फूटेगा जाकर भी अपना दाग देकर छूटेगा !

©#कुमार