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लहू से लहू धोये जा रहे
लहू से ही लहू धोये जा रहे हैं लहू के ही फसल बोये जा रहे हैं !
उम्मीद थी अब तो तिलिस्म छूटेगा चलो देर से ही सही मुकद्दर टूटेगा !
पर आज भी हम खुद से रूठ रहे हैं और अपनों के संग यूँ ही छूट रहे हैं !
रक्त आखिर कब तक विरक्त फूटेगा जाकर भी अपना दाग देकर छूटेगा !
©#कुमार
