माँ की साड़ी
पूरे साल माँ एक-एक पाई जमा किया करती थी ताकि तीज के मौके पर अपने लिए नई साड़ी खरीद सके। तीज तो हर साल आ जाता था बस नहीं आती थी तो माँ की वो नई साड़ी। ऐसा नहीं था कि माँ साड़ी खरीदना भूल जाती थी पर न जाने साड़ी खरीदते वक्त माँ को हर बार क्या और क्यों कुछ न कुछ याद आ जाता था। जिसे सोचकर माँ उन पैसों को खुदपर खर्च नहीं कर पाती थी।
वापस घर आने पर पापा जब पूछते साड़ी कहाँ है तब माँ कह देती की पेटी में नई साड़ी है इसलिए नहीं खरीदा। पापा जानते थे कि माँ झूठ बोल रही है, पर पापा की जेब हमेशा माँ के झूठ पर पापा को ये यकीं दिला जाते थे कि शायद माँ सच ही कह रही होगी।
...और फिर तीज वाले दिन माँ हर साल अपने गवना (बिदाई) वाली साड़ी पहन लेती और सच्चाई जानते हुए भी हर साल पापा पूछ बैठते ये साड़ी कब खरीदा?
बचपन में ये वाकया मेरे सामने एक नहीं कई बार हुआ। पर तब कहाँ समझ थी इतनी माँ-पापा के जिम्मेदारियों की और न ही उन जिम्मेदारियों की वजह से बोले गए सच और झूठ की भी।
पर आज अपनी शादी के सालों बाद एक पिता की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए जब भी उन जिम्मेदारियों को क़रीब से देखता हूँ, उन जिम्मेदारियों के झूठ को क़रीब से महसूस करता हूँ तो ऐसा लगता है मानों इन जिम्मेदारियों ने एक ही पल में मुझे बचपन में हुए उन वाकयों के सामने लाकर खड़ा कर दिया हो।
#लप्रेक #तीज़ #साड़ी #जिम्मेदारियाँ
...©#कुमार मौसम शोधार्थी, मीडिया अध्ययन विभाग महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार
