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मैं समंदर
मैं समंदर तू शहर हैं ! जिंदगी दोपहर हैं ? मिलन अधूरी सायं पहर की ? दिल से पूछो कैसी कहर हैं ! कोलाहल में दब गई आहें ; बदली जबसे तुमने राहें !
मैं तो अब भी तुमको पाने ? आ जाता हूं तुझमें समाने ! लेकिन, तुमने अपनी सोच बदल दी साहिल की आग़ोश बदल दी ! रफ्तारों में ऐसी लिपटी, ज्वारों के भी जोश बदल दी !
शहरों में हैं सजती रातें मेरे किनारें होती बातें ! खुश होते हो मेरे दम पे मुझको तनिक अभिमान ना हम पे !
तुझे सजाया तुझे संवारा मैं तो हूँ पागल आवारा शहरों की नित नई अलय हैं मेरा तो दिन-रात प्रलय हैं !
©#कुमार
