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मेरा चश्मा
मेरी एक वस्तु की कहानी, सुन लो मेरी जुबानी, यह कहती मुझसे क्या-क्या जान लो अब तुम, मेरी एक वस्तु की परेशानी पहचान लो अब तुम।
आंखें जब मैं खोलु मेरा चश्मा पुकारे, ना मिले अगर तो मैं घूमूँ मारे-मारे।
चश्मा मुझसे बोले मेरी कदर करले थोड़ी, नहीं तो भोगनी पड़ेगी तुझे बड़ी कमजोरी।
मुझे आँखों से लगाले, ज़रा मुझको भी चमकाले, मेरी थोड़ी कदर करले , मैं कोई गैर नहीं, तेरी आँखों का सहारा मैं कोई गैर नहीं ।
