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नासमझ कहा मुझे
नासमझ कहा मुझे हर्फ़ हर्फ़ पढ़ा जिसे !
वर्णमाला प्यार की दिया जो रटा उसे !
वर्ण-वर्ण, शब्द-शब्द क्या नहीं कहा जिसे !
हलंत से विसर्ग तलक कैसे-कैसे हैं सहा उसे !
उत्कर्ष पर चढ़ा मुझे सतह की फिकर जिसे !
गद्य की व्यंजना भी पद्य तक पढ़ा उसे !
तर्क से कुतर्क तक हर नज़्म में जड़ा जिसे !
©#कुमार
