← PrevNext →
नित नई जंग
रोज रोज का प्रेस कॉन्फ्रेंस लगता अब बेजान मुझे ! गहन अंधेरे से निकलो अब क्या मिला नही अवसान तुझे ?
देखो जरा निकल घेरे से चहुंओर बस बंदर बांट ! मिला रहे है कुंडलियाँ सब सबमें बस अपनों को छांट ?
किया सीमित जो दायरा तूने देंगे तुम्हें गुमनामी से जोड़ ! परिभाषा नित नई गणित की गढ़ने की बस लगी हैं होड़ ?
कायल मैं तेरे कलाम का घायल हैं मेरे बंद सभी ! अप्रतिम सा स्वप्न लिए जो बुने थे तेरे छंद कभी ?
©#कुमार
