पर्यावरण की पुकार
पर्यावरण सृष्टि के आरंभ और अन्त का सार है। आधारित इसी पर संसार है।
जहाँ तक पहुँचे नजर , हर ओर इसी का दरबार है। धरा से अंबर तक, इसका त्याग अपरंपार है।
मानवी विलासिता के खातिर , हो रहा इस पर भीषण प्रहार है। ढाये इस पर जुल्म इतना, जिससे हर ओर मचा चित्कार है।
तूफान, सुनामी, भूकंप, बाढ़, भूस्खलन, प्रदूषण मचाया हुआ हाहाकार है । हुआ क्षीण ओजोन, बढ़ा रोगों का भरमार है । मिट्टी, हवा, पानी भी ऊर्जा हीन का सिकार है ।
कर रहा इसे तबाह वही , जिसे संरक्षण का अधिकार है । ढा दिये सितम इतना, जिससे हर प्राणी खड़ा मौत के द्वार है ।
इसके संरक्षण में हर सरकार लाचार है । जाग उठेगी मानवी चेतना जिस रोज , उसी क्षण होने वाला इसका उद्धार है ।
आओ करे प्रण इसके संरक्षण का, जो प्रकृति का अनुपम उपहार है । लगाये वृक्ष, बचाये जल,स्वच्छ करें स्थल , निर्मल हो बहता जल, हुए सफल इसमें , तो पुनः जर्रे- जर्रे में बहार है ।
आओ हमसब मिलकर इस चमन को महफूज करें, जो हमारे जीवन का आधार है । लगा दे विराम उन कारको पर, जो कर रहा इस पर विध्वंसक प्रहार है ।
करें न्योछावर कुछ वक्त अपना इसके संवर्धन में, जिस पर सर्वस्व जीवन का दारोमदार है । करके नजरअंदाज इसे , जिन्दगी की कल्पना भी बेकार है । उठो मानव संजो कर अद्मय साहस अपना, आज यही पर्यावरण की पुकार है ।
©#सतीश
