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प्रकृति की गोद
दृश्य अवलोकन कर रहा हूं, रुक कर। सकुन से, खड़ा धूप में। मिठास सी गर्मी, दृश्य अवलोकन कर रहा हूं।
पहाड़ें चौड़ी की अपनी बाहें, जैसे बुला रही। लग जा गले, सारगर्भित हो जा। मिलन कर, अनंत में हो जा समाहित।
गर्मी लग रही, फिर भी खड़ा हो तुझे निहारूं। बड़ी विशाल लग रही हो, हरियाली भरी तेरी आंचल। मुझे बता रही, मत रुक तू।
चलता जा, एनएच 2 की इन राहों पर। एक सीधी रेखा, इतनी लंबी खींच तू। वाराणसी की गलियों का, दीदार करो।
गया वाराणसी का मिलन हो ऐसा। वैकुंठ मुक्ति की ओर चल पड़ा है। दृश्य अवलोकन कर रहा हूं, रुक कर। सकुन से, खड़ा धूप में। मंथन कर रहा हूं, प्रकृति की गोद में।
#tourtovaranasi
©#मिथिलेश कुमार
