← PrevNext →
प्रकृति की खूबी
बेजोड़ खूबी है, इस प्रकृति की। जितना भी ढूंडो, एकदम नई पहेली सी। सरल भी, सलिल भी, उपकारी ऐसी।
नित नई लगती है, नए रूप होते है। एक ही पक्ष, सदा निराले लगते है। कभी धूमिल नहीं पड़ती, सदा ऊर्जा का स्रोत। स्थिल नहीं पड़ती।
सभी तुम्हारी रचना है, तुम सबको रचती बसती। कभी नहीं रुकती, खुद उत्पन्न, हमारी उत्पत्ति करती। अनोखी हो तुम, खूबसूरत हो तुम। अव्याखित भी हो।
काल एवम् महाकाल सभी तुझमें शमाए। तुम्हारी विशालता इतनी, हम झांक ना पाए। काल, महाकाल की प्रकटी, हमारा प्रणाम। नित नई लगती हो तुम।
#प्रकृति
©#मिथिलेश कुमार
