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रात का तन्हा सफर !
दर्द का बेदर्द बालम अपने हिस्से में पड़ा, रात का तन्हा सफर संग उसके चल पड़ा।
बात कहने की बहुत कौन किसकी सुनता, अपने ही आकार से फूट जाता है घड़ा
मुफलिसी का दौर यह बीत जायेगा जरूर, कल ये कोई न कहे अंत तक नहीं लड़ा।
हाथ में खींची लकीरें क्या जानूँ क्या कहता, टूटने को बेताब पत्थर एक मुट्ठी जो जड़ा।
क्या बयां हो बार-बार वो जुदाई का अलम, फिर तो नामुमकिन है यारों रह पाना खड़ा।
शब्दार्थ:
आलम-संसार अलम-दुःख,दर्द
©#रंजीत
