रात की राह
रात की लंबी राहों पे, खड़ा हूं। चला जा रहा हूं, सुनसान राहों पे। दरख़्त वृक्षों का रेला, बिल्कुल शांत। गवाही देने वाली, सो रही है मानो।
बिल्कुल आजाद हूं, किसी व्यवधान से परे। चलता जा रहा हूं, कुछ खोजता हुआ। कुछ सोचते हुए, अंत कहां है इनका। इन रात की लंबी राहों का, खड़ा क्यों हूं?
चलता जा रहा हूं, सुनसान राहों पर। आश लिए उजाला की, रात का मतलब अंधेरा नहीं। अतः प्रकाश का उदय होगा, बढ़ता जा सुनसान राहों पे। रात की लंबी राहों पे, खड़ा हूं।
रात कहीं क्या ठहर सकती, काल चक्र के नियम ऐसे। नया उजाला आएगा, सूर्य की आभा प्रदर्शित होगी। बच्चो की कोलाहल गूंजेगी, रंगीली होगी ये दुनिया। हर रात के बाद दिन होगी, इसे नहीं कोई झुठला सकता।
तू बस चलता जा, रात की लंबी राहों पर। दूब जा इनकी गहराईयों में, प्रकाश की खोज में। चला जा रहा हूं, सुनसान राहों पे। दरख़्त वृक्षों का रेला, बिल्कुल शांत।
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©#मिथिलेश कुमार
