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Narendra Prasad Nirala
Narendra Prasad NiralaCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·4 min read·

बड़ों का सम्मान करें

भारतीय समाज में बुजुर्गों का हालात बेहाल होते जा रहा है, इसी से संबंधित मैं अपना निजी अनुभव बांट रहा हूँ,आशा करता हूँ  कि आपको पसंद आयेगा ।

दादी

बचपन में मैं दादी को पहली और आखिरी बार ‘बुढ़िया’ कहा था और दादी ने पापा जी से कह दी कि मैंने उन्हें बुढ़िया बोला है। और पापा आव देखे न ताव बस मुझे पीटना शुरू कर दिए। मेरी माँ कि हिम्मत ना हुई कि कुछ बोले क्योंकि शायद पापा माँ पर गुस्सा उतार दे या मुझे और मारे। आखिर माँ मौन रहना ही मुनासिब समझी क्योंकि गलती मेरा ही था। जिसे अब मैं स्वीकार करता हूँ।

लेकिन दादी मेरे लिए ही तो मुझसे पूछी थी कि दिन भर कहाँ था,चुकि खेलने के चक्कर में मैं सुबह से शाम तक कुछ नहीं खाया था यह प्रश्न  पूछना लाजमी था।शायद ही मेरा जबाब किसी को पसंद आता क्योंकि मैंने कहा था कि
’बुढ़िया हम खाए या नहीं तोरा वोही से कि मतलब’।

आज जब भी घर जाता हूँ तो सबसे ज्यादा वही खुश होती है और आशीर्वाद भी देती है,कि मैं बड़ा आदमी बनू। क्योंकि मै पढाई कर रहा हूँ और मैं उनके प्रति सम्मान प्रकट करता हूँ तथा उनकी मेरे प्रति सदा प्यार बरसते रहेगा।

नानी

नाना जी अक्सर मुस्कुराते हुए कहते है कि मेरे सोलह नाटी-नाटिन,पोता-पोती है। नाना- नानी के चेहरा पर सदा मुस्कान बनी रहे ऐसा हम इश्वर से प्रार्थना करते है।लेकिन उनकी मुस्कुराहत को किसी की नज़र लग गई है। क्योंकि नानी लगभग 60 दिनों से PMCH (पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल) के इमरजेंसी वार्ड में एडमिट है, जिससे वह जल्दी ठीक हो सके। मेरी माँ एडमिट करवाने के बाद पंद्रह दिन और होली से पहले दस दिन उनके साथ वही रही है। जिससे उनको कोई दिक्कत न हो। नानी का देखभाल हमलोग कई वर्षो से लगातार करते आ रहे है क्योंकि नाना जी एक परिचित का धनबाद में एक मकान बनवाने के लिए गए थे। नानी को गठिया है लेकिन अभी कंठ में सुजन हो गया था जिसका लगातार इलाज चल रहा है।

कुछ लोग मेरी माँ को बेवकूफ और लालची समझते है। बेवकूफ इसलिए क्योंकि वे अपने बच्चे और घर कि ओर ध्यान नहीं देती है और अपने माँ (मेरी नानी ) की सेवा में रहती है। तथा लालची इसलिए क्योंकि नाना- नानी के मरने के बाद उनके संपत्ति के वारिश हमलोग ही होगें। वैसे कानूनन जमीन पर अधिकार पुत्री का भी होता है और उससे ज्यादा जो उनकी सेवा करता है। यहाँ बता दूँ कि मैं अपने माँ-पापा और भाइयों के ओर से बोल देता हूँ कि “मुझे उनकी संपत्ति में से सुई के नोक के बराबर भी नहीं चाहिए।”

मेरी माँ ही क्यों ?

मेरी माँ धार्मिक प्रवृति की है,प्रतिदिन पूजा करने के बाद ही खाती है,शायद इसलिए उन्होंने गीता में बताए गए निस्वार्थ सेवा कर रही है।लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता हूँ,क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य है कि वे अपने मम्मी-पापा का सेवा करे क्योंकि प्रत्येक माँ अपने बच्चे को नौ माह गर्भ में रखकर अपनी खून से उसको सीचती है और लगभग दो वर्षो तक उसी खून से बना दूध पिलाती भी है,इतना ही नहीं जब भी अपने बच्चों पर कोई संकट आती है तो उसे हर संभव दूर करती है चाहे उन्हें कई दिन-रात जागना ही क्यों ना पड़े।

बस उसी का रिटर्न मेरी माँ कर रही है,और शायद इसलिए भी की हम चारों भाई कुछ सिख सके। चाहे दुनिया कुछ भी कहे हम अपनी माँ के साथ है।

सामाजिक कुव्यवस्था

माँ–बाप के मृत्यु के बाद उनके बच्चे मृत्यु भोज करते है जिससे समाजिक व्यवस्था कायम रहे। लेकिन मैं उसे बेतुका मानता हूँ क्योंकि जीवित व्यक्ति को ना तो उनका बेटा देखता है और न ही समाज का कोई वर्ग। और उनके मरणोपरांत पत्ता चाटने के लिए समाज तथा चटाने के लिए उनका बेटा सदा तात्पर्य दिखाई पड़ते है।

इसका उपाय यह हो सकता है कि मान लेते है कि मृत्यु भोज में एक लाख रुपया खर्च होगा जिसे व्याज पर लगा देना चाहिए और इस रूपये से प्राप्त व्याज से उनकी देखभाल करनी चाहिए।

हो सकता है कि कई लोग मेरा विरोध करे लेकिन समस्या का समाधान विरोध करना नहीं समाधान निकालना है ,यदि आपके पास कोई समाधान है तो कृपया comment करें।

आगे कि राह

परिवार में नफा-नुक्सान नहीं देखा जाता है।यदि कोई गलती हुई हो तो पहल करके गहती स्वीकार करे और उनसे माफ़ी जरुर मांगे।उनको अपना होने का अहसास कराए और प्यार करे।अपने बुजुर्गो का सम्मान करे और उनका ख्याल रखें,जिससे बच्चे भी सीखे और वह भी सभी का सम्मान करे।

गायत्री परिवार के सस्थापक पंडित श्री राम शर्मा आचार्य कहते है कि “सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है,जो वाणी से नहीं आचरण से प्रस्तुत किया जाता है।”

विचारणीय प्रश्न:

क्या वृद्धजनों को उनकी हालत छोड़ देना चाहिए ? उरोक्त स्थिति भारतीय समाज में फ़ैल चूका है,इसके जिम्मेदार कौन है और उसके तत्कालीन और दीर्घकालीन समाधान क्या हो सकता है?

क्या वैसे पुत्रो को सामाजिक बहिस्कार करना चाहिए या आपस में समाधान निकलना चाहिए ? पीड़ित बुजुर्ग को चाहिए कि वो अपनी सम्पति का कुछ भाग बेच दे और वृद्धाश्रम खोले जिससे वो अपने जैसे लोगों का समाधान दे सके ?

©#नरेन्द्र प्रसाद निराला