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Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

शिवदर्शन

बैठा मै सुरती लगा, एक पीपल वृक्ष तले। चाहा मैंने जान लू, इसके राज एवम् उम्र। सबने बोला, ये ना ही हमारे पूर्वजों को मालूम, ना हमे। किसी को मालूम नहीं उम्र, बस सैकड़ों वर्ष पुरानी।

आश्चर्यचकित हूं, गंभीर भी, जनाने की बस। कोशिश में लगा, क्या है प्राकृतिक के राज सभी। विशाल पीपल वृक्ष तले, कभी बैठ उसके डाल पर। कभी नीचे, जड़ से जुड़कर। बैठा सुरती लगाकर।

जिंदगी की गहराई में उतरता गया, समय रुकता गया। महाकाल की आगोश में, काल के परे दुनिया। आंखे मूंद, ध्यान आज्ञा चक्र पर, मध्यमा हुई है स्पंदित।

शंकर की थाप पर, नाचती इनकी तने। बार बार जमीन से जुड़ कर, आगे बढ़ती। मै सुरती लगा, सब देख पा रहा हूं। जीवन की स्रोत की, क्या प्यारी रचना है।

बैठा मै सुरती लगा, एक पीपल वृक्ष तले। चाहा मैंने जान लू, इसके राज एवम् उम्र। सुरती लगा बैठा हूं, शिव के दर्शन करता हूं। मन ही मन, सुरती लगा बैठा हूं। #शिवदर्षण #सुरती

©#मिथिलेश कुमार