टीम में चलने की अहमियत
साल 2017 के और पिछले कुछ वर्षों के नोबेल पुरस्कार को समूह में दिये जाने के बाद टीम की महत्ता पर एक लेख प्रकाशित करने का विचार मन में आया।इतिहास में बहुत सारे नायाब उदाहरण है जिसमें टीम को मिली सफलता का जिक्र स्वर्ण अक्षरों में वर्णित मिलता है।सन 1953 में विश्व की सर्वोच्च पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट पर मनुष्य के चढ़ने की घटना को हम कभी नहीं भूल सकते।न्यूजीलेंड के एडमंड हिलेरी और नेपाल के तेनजिंग शेरपा ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर मिसाल कायम किया था।
दरअसल,वर्तमान सामाजिक एवं आर्थिक संरचना इस कदर बदल रही है कि संगठन में चलना अनिवार्य सा हो गया है।जाने-अनजाने हम किसी न किसी संगठन के भाग स्वतः हो जा रहे है।वर्ष 1993 के बाद जब से भारत में आर्थिक उदारीकरण,निजीकरण और वैश्वीकरण हुआ है तब से मजदूर संघ,किसान संघ,व्यापारी संघ,युवा संगठनों की बाढ़ सी आ गयी है।यहाँ तक कि सिविल सेवकों का,बैंक कर्मचारियों का भी अपना-अपना संघ है।
वेद में कहा गया है-"संघे शक्ति कलयुगे"।लगता है अब यह सूक्ति चरितार्थ हो रही है।
सवाल उठता है कि हम संघ क्यूँ बनाएँ,अकेले चलने में क्या हर्ज है?दोस्तों,आपका सवाल जायज है।ऐसा इसीलिए क्योंकि हमारे दिमाग में कई डॉयलॉग बजते रहते है;जैसे-"हम जहाँ से शुरू होते है,लाईन वहीं से शुरू होती है";"शेर कभी झुंड में नहीं चला करते";"एकला चलो रे",आदि-आदि।
इसका परिणाम यह होता है कि सोशल मीडिया पर हमारे सैकड़ों मित्र होते है और असली जीवन में एक भी नहीं।हम अत्यंत नाजुक श्रेणी में कब प्रवेश कर जाते है पता ही नहीं चलता।इसी नाजुकता का फायदा उठाता है साइबर क्राइम वाले।ब्लू-ह्वेल जैसे गेम युवाओं कि जान ले लेते है,आतंकवादी संगठन इन्हें अपना शिकार बना लेते है।
हाँ,संगठन बदलने की आजादी हमें लेनी चाहिए।संगठन बदलना एक परिपक्व मानसिकता को दर्शाता है,हमारी निर्णय लेने की सक्षमता को जाहीर करता है।लेकिन हमें संगठनच्युत नहीं होना चाहिए।मान लीजिए,आसमान में बादलों के दो समूह विचरण कर रहे है-एक काले बादल का,दूसरा उजले बादल का।उजले समूह का एक छोटा सा टुकड़ा अगर उससे अलग होकर थोड़ी देर हवा में उड़ता है और काले बादल में समा जाता है तो इसमें कोई नुकशान नहीं है।अगर वह टुकड़ा हवा में स्वतंत्र रूप से उड़ता रहे किसी से न मिले जुले तो तेज हवा का झोंका उसे उड़ा कर ले जाएगा ,उसके अस्तित्व को खत्म कर देगा। अब वह बादल नहीं बाँकी जलवाष्प बनकर रह जाएगा।
टीम हमें बुरे वक़्त में टूटने से बचाता है।हमारी जिंदगी भी टीम ही है।जिसमें हमारे सगे-संबंधी ,यार-दोस्त टीम मेम्बर के रूप में होते है।स्कूल की टीम,कॉलेज की टीम,ऑफिस की टीम और फिर फैमिली की टीम।अगर हम टीम भावना से अपना जीवन जीना सीख लें तो मैच रोमांचक और विजय दिलाने वाला बन सकता है।
एकाकीपन छोड़ें ,मिल जुल कर रहें।लोगों को सम्मान दें,लोगों का प्यार लें।खुशियाँ बातें,मुस्कुराते रहें।
