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Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

सिंघाड़े के पेड़

बचपन के सिंघाड़े के पेड़, ऐसे थे। जैसे समझता, तोड़ लाऊंगा चढ़कर। जलला के गांव में, एक अहरी शांत थी। बैगनी है, हरी सी, छाई हुई तली पर।

लगता कुछ खास, पूछ पड़ता। यह है क्या, चाचा चाचा। ओ बोलते, धत भटियारा। ई भी नहीं, जाना ही। ऐही तो है, सिंघाड़ा के पेड़।

गजब है, बच्चा वाली सोच। बिना कोई बंदिश, सोच लेता सभी। पा लूंगा चांद भी, सभी ऐसा लगते।

आज वैसी सोच की दरकार है, सोचते सभी। कुछ पूर्वाग्रहों के साथ, बदल जाते अर्थ। सिंघाड़े पेड़ पर सही, सोच थी बड़ी पक्की।

पूछता बिना किसी दर के, सोचता उड़ानों वाली। बचपन के सिंघाड़े के पेड़, ऐसे थे। जैसे समझता, तोड़ लाऊंगा चढ़कर।

#सिंघाड़े

©#मिथिलेश कुमार