सिसकता बुढ़ापा
लोग हैं तो परेशानी, लोग ना है तो परेशानी यह कैसी दास्तान ? यह कैसी कहानी ?
कितना सुनाऊं मैं अपनी जुबानी । बढ़ती जाती निरंतर परेशानी, मिट जाती कितनों की जवानी, हर घर में सिसकता बुढ़ापा , याद कर अपनी जवानी । लोग हैं तो परेशानी .......
सारे जीवन की कमाई एक क्षण में हो जाता बेकार, अगर गाली दे दे कोई अपना रिश्तेदार। वो इज्जत और शोहरत सब मिट्टी में मिल जाती है, जब अपनों द्वारा की गई बेइज्जती याद आती है।
जिन्हें पलकों पर बैठाया, जिन्हें चलना सिखाया, जिन्हें हर दौर में ढलना सिखाया, वही आंखें लाल हो , आज मेरी तरफ उठ जाती है, बुढ़ापा अपनी दर्द भरी व्यथा सुनती है ।
कितना नादान है बुढापा? लाख समझाओ फिर भी समझ नहीं पाती है। उन्हें हर वक्त अपनों की याद दिलाती है!
अपना ही बेटा करता बेघर, निकल पड़ते दुनिया में करने को अकेले सफर, फिर भी नहीं कहते किसी से कि बेटे का मुझपर टूटा है कहर, उस वक़्त खामोश लगती है उन्हें समंदर की उठी ऊंची लहर, उससे तो बड़ा है खुद पर टूटा बेटे का कहर। लाखों सपने सजाए होंगे उस बेटे के लिए, लोग हैं तो परेशानी .......
अपने आराम बुलाए होंगे, अपने हर अरमान मिटाएं होंगे, तब बेटे कुछ बन पाए होंगे। अपने खून से लिखी होगी इनकी कहानी अपने लहू को जलाकर बचाएं होंगे इनकी जवानी । इसीलिए बेघर,लाचार और तड़पती हुई सिसक रही है बुढ़ापे की कहानी । लोग हैं तो परेशानी ,लोग ना है तो परेशानी......
©#सतीश
