स्थायी खुशी पाने का माध्यम
दो संसार हैं-एक दृश्य और दूसरा अदृश्य।हर व्यक्ति को इन दोनों संसार के साथ ताल्लुक रखना पड़ता है।दृश्य संसार के साथ व्यक्ति का शरीर सौदा करता है और अदृश्य संसार के साथ व्यक्ति की आत्मा।नास्तिक लोग,जो ईश्वर पर विश्वास नहीं करते और चार्वाक दर्शन के समर्थक है,वे आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते।इस प्रकार वे अदृश्य संसार को भी नहीं मानते।
आस्तिक लोग ,जो ईश्वर तथा ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार करते है वे दृश्य संसार को अदृश्य संसार की परछाई मात्र मानते है।दृश्य संसार को शरीर की पाँचों इंद्रियाँ महसूस करती है।आँखें इसे देख सकती है,कानें इसे सुन सकती है,नाक इसे सूँघ सकती है,जीभ इसका स्वाद ले सकती है और त्वचा इसकी छुअन को परख सकती है।
अदृश्य संसार को आत्मा महसूस कर सकती है।मन की शांति या अशांति,चित्त का दुःख-सुख,डर,क्रोध,प्यार,विरह,पश्चाताप,खुशी,निराशा,वासना,तड़प,आदि अदृश्य संसार में होने वाली हल-चल है।एक बच्चा जब जन्म लेता है तो वह अदृश्य संसार से दृश्य संसार में पदार्पण करता है।एक छोटे बच्चे में अलग-अलग मात्रा में दृश्य संसार एवं अदृश्य संसार के प्रति आकर्षित अथवा विकर्षित होने के गुण अथवा अवगुण होते है।भारतीय शास्त्रों में इन गुणो को पूर्व जन्मों के संचित संस्कार माना गया है।
जब बच्चा बड़ा होता है और एक व्यक्ति के रूप में समाज का अंग बनता है तो उनकी रुचि किस संसार में है यह दिखने लगती है।अदृश्य संसार की तरफ झुकाव वाला व्यक्ति सत्संग में आनंद लेगा,भगवान के भक्तों का संग खोजेगा,मंदिर जाएगा,मस्जिद जाएगा,इत्यादि।दृश्य संसार की तरफ झुकाव वाला व्यक्ति मस्ती करने में ,भोग करने में अपनी रुचि दिखाएगा।अय्यासी करने में उन्हे खुशी मिलेगी।
भारतीय शास्त्रों में दृश्य संसार की मालकिन को माया देवी कहा गया है और अदृश्य संसार के मालिक को ईश्वर कहा गया है।ईश्वर के कई नाम दिये गये है।दृश्य संसार को भौतिक जगत कहा गया है।विषयों की पढ़ाई इसी भौतिक संसार से संबन्धित है।भूगोल,इतिहास,राजव्यवस्था,अर्थशास्त्र,समाजशास्त्र,पर्यावरण शास्त्र,विज्ञान,तकनीकी,इत्यादि विषयों में इस भौतिक संसार के बारे में पढ़ाया जाता है।संपदाओं की जानकारी,उनके दोहन,उनका प्रबंधन सारा कुछ भौतिक संसार से संबन्धित चीजें है।
अदृश्य संसार को आध्यात्मिक जगत कहा गया है।भारतीय शास्त्र और सनातन धर्म आध्यात्मिक संसार का विवरण प्रस्तुत करता है।कथा,प्रवचन,लीलाएं,पर्व,त्योहार,इत्यादि के माध्यम से व्यक्ति अदृश्य संसार से अपना संबंध बनाए रखता है।
वर्तमान समाज दृश्य संसार की तरफ उन्मुख है।संसाधनों के एकत्रीकरण,दोहन और उपभोग पर व्यक्ति के क्रियाकलाप केन्द्रित हो गए है।विदेश नीति,राजनीति,नौकरशाही,व्यवसाय,आदि दृश्य संसार को उन्नत बनाने में तथा शरीर से संबन्धित जरूरतों की पूर्ति करने में लगा हुआ है।वर्तमान समाज में अदृश्य संसार के तरफ भी लोगों का ध्यान है।मंदिर बन रहे है,हज यात्राएं हो रही है,महापुरुषों की जयंती मनाई जा रही है,समागम हो रहे है,फिर भी ये अदृश्य संसार की गरिमा बढ़ाने में नाकामयाब रहे है।
जानकार लोग बता रहे है कि शिक्षा व्यवस्था इसका प्रमुख दोषी है।भौतिक शिक्षा चरम पर है परंतु आध्यात्मिक शिक्षा का लोप हो रहा है।आध्यात्मिक शिक्षा को नई ऊँचाई पर ले जाने के लिए कथा परंपरा को ,सत्संग परंपरा को वैज्ञानिक ढंग से पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
आध्यात्मिक शिक्षा का आधार भारतीय धर्म शास्त्र और सनातन धर्म की परंपरा है।सनातन धर्म वो है जिसके आरंभ अज्ञात है।भारतीय वैष्णव धर्म ही सनातन धर्म है।अन्य धर्म का स्त्रोत एवं आरंभ ज्ञात है।जैसे-पैगंबर साहब के आने पर मुस्लिम धर्म अस्तित्व में आया,ईसु महाराज के आने पर ईसाई धर्म चला।इसी प्रकार सिक्ख धर्म,बौद्ध धर्म,जैन धर्म,इत्यादि का उद्गम ज्ञात है।
भौतिक शिक्षा पाकर हम समृद्ध होने का सूत्र खोज सकते है और समृद्ध हो भी सकते है।भौतिक साधनों से हम अस्थायी खुशी पा सकते है।भोजन,वस्त्र,आवास,गाड़ी,प्रेमी,इत्यादि हमें कुछ पल तक ही खुश रख सकते है।कुछ देर भोगने के बाद ऊब होने लगती है।एक उम्र के बाद शरीर भी साथ नहीं देता।
स्थायी खुशी पाने के लिए आध्यात्मिक शिक्षा ही एक मात्र उपाय है। मन की शांति,स्थायी खुशी,जीवन का स्थायी आनंद सिर्फ आध्यात्मिक शिक्षा ही दे सकती है। आध्यात्मिक शिक्षा के बारे विस्तार से जाने मेरे अगले लेख में।यह लेख जल्द ही प्रकाशित होगा।
