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Rahul Devashish
Rahul DevashishCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·2 min read·

राम के वनवास की कहानी

अपने गैर-भारतीय मित्रों (Non-Indian Friends) के माँग पर मैं रामायण विश्लेषण शृंखला(RAMAYANA Analysis Series) का अपना तीसरा लेख प्रकाशित कर रहा हूँ। अयोध्या कांड की यह घटना वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में अत्यंत ही प्रासंगिक है अतः मेरी आशा है कि मेरे भारतीय मित्रों को भी यह लेख पसंद आये।

यह घटना तब की है जब अयोध्या के तत्कालीन राजा दशरथ थे।उस समय इंडिया डेमोक्रेटिक स्टेट नहीं था।यहाँ पर राजतंत्र(Monarchy) था  और राजा अपने  विवेकाधिकार(Discretion) से अपना उत्तराधिकारी चुनते थे। उस समय बहुविवाह(Polygamy) का प्रचलन था और अयोध्या नरेश दशरथ की तीन रानियाँ थी-  कौशल्या(बड़ी),सुमित्रा(मँझली) और कैकेयी(छोटी)। श्रीराम कौशल्या का,श्रीलक्ष्मण सुमित्रा का और भरत एवं शत्रुघन कैकेयी के बेटे थे।चारो भाई विवाहित थे और उनकी वाईफ क्रमशः सीता,उर्मिला,मांडवी और श्रुतकृति थी।

एक दिन राजा दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र(Eldest Son) श्रीराम को अपना उत्तराधिकारी(Heir) चुनने का घोषणा किया। श्रीराम के राज्याभिषेक(Swearing) की घोषणा से लोग बहुत ही प्रसन्न हुए।उस समय की सोशल मीडिया पर यह न्यूज़ जंगल के आग की तरह फैल गयी।लोगों ने अपने-अपने ढंग से सेलिब्रेट किया,ऑफिस में मिठाइयाँ बाँटी गयी,शेयर मार्केट का इंडेक्स उस साल के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया। यह सब श्रीराम के करिश्माई नेतृत्व छवि (Charismatic Leadership Personality) के कारण हुआ।लोगों में श्रीराम के आने से राम राज्य(Good Governance) की उम्मीद जगी।

लेकिन घोषणा वाली रात को ही एक अनहोनी बात (Mid-Night Tragedy) हो गयी।राजा दशरथ जी और कैकेयी जी के बीच एक लेन-देन(Deal) हुआ।जिसका नतीजा यह हुआ कि  दशरथ जी को श्रीराम को अपना उत्तराधिकारी चुनने का फैसला रातोंरात बदलना पड़ा।इतना ही नहीं कैकेयी ने श्रीराम के लिये  14 साल के लिए राजगद्दी पर बैठने से निष्काषन (Rustication) और देशनिकालाव/वनवास(Exile) का पत्र(Letter) दशरथ जी से हस्ताक्षरित(Signed) करवा लिया।कैकेयी ने अपने सगे बेटे भरत का नियुक्ति-पत्र(Appointment Letter) भी दशरथ जी से ले लिया।

अब अयोध्यानरेश का प्रतिभागी(Candidate) भरत थे जो अभी अपने छोटे भाई शत्रुघन जी के साथ विदेश यात्रा(Foreign Tour) पर थे।उस समय इंटरनेट नहीं था इसलिए भरत जी को किसी ने ईमेल नहीं किया और न ही भरत जी इस खबर की सोशल फीड (RSS Feed) कहीं पढ़ सके।

राज दरबार के साथ-साथ पूरे मुल्क में और पड़ोसी देशों(Neighboring Countries) में दशरथ जी के इस निर्णय(Decision) की काफी आलोचना हुई।उस समय के चौपाल(Television Show) पर चर्चायें (Discussions) होने लगी।उस समय के ऋषि-महर्षियों(Think Tanks) ने संपादकीय (Editorials) लिखे।लेकिन इन सब का राजा दशरथ के निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ा क्यूंकी उनके वंश का एक नारा (Slogan)था-"रघु कुल रीति सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई (What has been said once that is irreversible) " ।श्रीराम ,सीता और लक्ष्मण तीनों वनवास को चले गये।