बेजुबान की बोली
"बेजुबान की बोली"
मुर्गे की बांग से नींद खुल जाने वाली, और गोरैये की चहक से झपकी टूट जाने वाली, कौवे की कॉव-कॉव से भूख लग जाने वाली वो सुबह अब नहीं हो पाती।
गली का वो कुत्ता जो बगल से पार होने पर गर्दन उठाकर एक बार देखता और फिर बेफिकर होकर सो जाता।
वो पड़ोस की बिल्ली मौसी कभी-कभी दूध पीकर भाग जाती कभी अपने मुँह में चूहे पकड़ कर हमें दिखाती।
गिलहरी को जब मूँगफली देता, दोनों हाथो से उठाकर मुँह में लेकर कुतरने लगती और किसी की आहट पाते ही फुर्र से पेड़ पर चढ़ जाती।
वो मंद बुद्धि वाला बगुला, घंटो तक पानी में बकोध्यान करता था पेटभर मछली पकड़ने के लिये।
बरसाती तालाब के किनारे जब कोई मेढक(बेंग)चीं-चीं करता तो समझ जाता था कि बिसहरी साँप बेंग खा रही है।
भालू वाला आता चौराहे पर अपना मजमा लगाता भालू को नचाता और अनाज और पैसे वसूलता।
मरे हुए जानवर को चीरकर जब चमार जाता था तो ताड़ के पेड़ पर बैठे गिद्ध माँस पर लपक पड़ता।
आम के मौषम में,लंगूरों का झुंड अपने छाती से अपने बच्चे को चिपकाये हुए जंगल से गाँव की तरफ आता और फुलवारी में कोहराम मचाता।
अब फिज़ा में बदलाव आया है मनुष्य और जीव-जंतुओं के बीच टकराव बढ़ा है। ये बेजुबान अपनी पीड़ा कह नहीं पा रहे है और सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव के हाथों मारे जा रहे है।
मोबाईल के टावर खड़े किये गये है, बिजली के खंभे गाड़े गये है, रेल की लाइने बिछाई गयी है, रोड के नेटवर्क तैयार किये गये है।
मानव ने सुंदर जाल बुन डाला है, ठीक मकड़ी के जाल की तरह जिसमें दूसरे का शिकार करनेवाली मकड़ी एक-दिन खुद उसी में उलझकर दम तोड़ देती है।
