← PrevNext →
Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

तुम्हारी चिट्ठी

पुरज़ा मिला इक मुड़ा सा अश्क़ बिखरे जज़्ब से !

रह गई कैसे अधूरी भूल बस नादान से !

ख़त तुम्हारा फिर मिलेगा ये सोचकर हैरान से !

आरज़ू मिलने की होगी यूँ पढ़ा अरमान से !

धुंधली काया सी छाई फिर मिट गया अवसान से!

याद आई फिर तुम्हारी इश्क के वरदान से !

©#कुमार