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तुम्हारी चिट्ठी
पुरज़ा मिला इक मुड़ा सा अश्क़ बिखरे जज़्ब से !
रह गई कैसे अधूरी भूल बस नादान से !
ख़त तुम्हारा फिर मिलेगा ये सोचकर हैरान से !
आरज़ू मिलने की होगी यूँ पढ़ा अरमान से !
धुंधली काया सी छाई फिर मिट गया अवसान से!
याद आई फिर तुम्हारी इश्क के वरदान से !
©#कुमार
