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Narendra Prasad Nirala
Narendra Prasad NiralaCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·2 min read·

बेरोजगारी ! उनसे सुनते न बनी, हमसे सुनाई न गई।

वाकई ! कितनी ताजुब की बात है,सरकार रोजगार उत्पन्न नहीं कर पा रही है। और युवावर्ग 'पद्मावत की जादुई तिलिस्म' में दीवाने की तरह मदमस्त है,और  इस तरह खो गये है कि इन्हें वास्तविकता की खबर ही नहीं है।  दोस्तों, निंद्रा छोड़े और जरा सोचिए। बेरोजगारी की बात है ।

कहना चाहा तो मगर बात बताई न गई, दर्द को शब्दों की पोशाक पिन्हाई न गई, और फिर खत्म हुई ऐसे कहानी अपनी, उनसे सुनते न बनी, हमसे सुनाई न गई।

कौन सुनेगा ? किसे सुनाऊ ? युवाओं का दर्द । राजनेता हो या समाज सेवक सभी 'अपनी रोटी' सेकने में लगें है । और मुद्दा बदल-बदल के युवाओं को अंधकार में रखा जाता है। ताकि युवा अपनी 'हक की रोटी' मांग नहीं बैठे । ऐसा लगता है 'संविधान के उद्देशिका' में पूंजीवाद जुड़ गया हालांकि ऐसा नहीं हुआ है,लेकिन कुछ भी हो सकता है। देश जो बदल रहा है ।

हमारे प्रतियोगिता में मशीन और रोबोट जैसे मानव निर्मित सामग्री शामिल है इसलिए एक बार धैर्य से 'नया दौर' फिल्म जरूर देखिए । और विचार कीजिए बेरोजगारी क्यों बढ रहा है  ? जब नौजवानों को पकोड़े और चाय ही बेचना है, तो पढाई क्यों करें ? क्या अभिभावक अपने बच्चे को शिक्षित इसलिए करते है ? साहब , ऐसा नहीं है, वे अपने बच्चे को इसलिए शिक्षित करते है ताकि वे सुखी से रह सके और दो वक्त की रोटी के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े । आज तक मैंने नहीं सुना है कि उन महानुभावों के बच्चे पकोड़े और चाय बेचते है। इनके लिए तो सीटें रिर्जव होता है । खैर , गैर-जिम्मेदार लोगों की बात ही क्या करना ?

दोस्तों, क्या ऐसा नहीं लगता है कि स्वामी विवेकानंद जी के एक वाक्य पर समाज़ को विचार करना चाहिए , और अमल भी । "उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाओ।" प्रश्न यह है कि उठेगा कौन और लक्ष्य क्या है ? इसके उत्तर से पुर्व एक वाक्य जो सभी सुनते आ रहे है "आवश्यकता अविष्कार की जननी है ।" अब प्रश्नानुसार 'जरुरतमंद लोग' उठेगा,तो ये कौन है ? 'बेरोजगार युवा' । बेरोजगारी को दूर करने के लिए अविष्कार करना है तो लक्ष्य है 'रोजगार के अवसर उत्पन्न करना । अब बड़ा सवाल यह है कि जरूरतमंद लोग रोजगार के अवसर कैसे उत्पन्न कर पाएंगे ? 'आंदोलन करना' इसका समाधान नहीं है,लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन होना चाहिए  क्योंकि सरकार को पता तो चले 'भारतीय युवा जाग गये है',अब 'नियुक्ति में विलंब करना' अपने कुर्सी से हाथ धोना है।

इतना ही नहीं 'भारत में शिक्षा' का स्तर काफी गिरा है । विश्व में भारत के विश्वविद्यालय का रैंक 200 से बाहर है । और कक्षा 8 के विद्यार्थी किताब नहीं पढ पाता है तथा तीन अंकों के घटाव भी नहीं बना पाते है इसलिए इस क्षेत्र में युवाओं का भविष्य उज्जवल है, कोचिंग, विद्यालय और विश्वविद्यालय खोलिए और लग जाईए नव-भारत के सृजन में ।

©#नरेन्द्र प्रसाद निराला